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Album :Classic Forever ( Jagjit Singh )



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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है
तेरे आगे चाँद पुराना लगता है

तिरछे तिरछे तीर नज़र के लगते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता है

आग का क्या है पल दो पल में लगती है
बुझते बुझते एक ज़माना लगता है

सच तो ये है फूल का दिल भी छलनी है
हँसता चेहरा एक बहाना लगता है


                                 " कैफ़ भोपाली "

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मेरे क़रीब ना आओ के मैं शराबी हूँ
मेरा शऊर जगाओ के मैं शराबी हूँ

ज़माने भर की निगाहों से गिर चुका हूँ मैं
नज़र से तुम ना गिराओ के मैं शराबी हूँ

ये अर्ज़ करता हूँ गिर के ख़ुलूस वालो से
उठा सको तो उठाओ के मैं शराबी हूँ

तुम्हारी आँख से भर लूँ सुरूर आँखों में
नज़र नज़र से मिलाओ के मैं शराबी हूँ


                                    " सबा सीकरी "

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कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा
मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

दिल-ए-नादाँ न धड़क, ऐ दिल-ए-नादाँ न धड़क
कोई ख़त ले के पड़ौसी के घर आया होगा

गुल से लिपटी हुई तितली को गिरा कर देखो
आँधियों तुम ने दरख़्तों को गिराया होगा

‘कैफ’ परदेस में मत याद करो अपना मकाँ
अब के बारिश ने उसे तोड़ गिराया होगा


                                         " कैफ भोपाली "

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उसकी बातें बहार की बातें
वादी-ए-लालाज़ार* की बातें       ( गुलाब की वादी )

गुल-ओ-शबनम* का ज़िक्र कर ना अभी       ( फूल और ओस )
मुझको करनी है यार की बातें

मखमली फ़र्श पे हो जिनकें कदम
क्या वो समझेंगे ख़ार* की बातें       ( कांटे )

शेख़* जी मैकदा* है काबा* नहीं       ( पंडित, शराबखाना, मस्जिद )
याँ तो होंगी ख़ुमार की बाते

इश्क़ का कारवाँ चला भी नहीं
और अभी से ग़ुबार की बातें

ये क़फ़स* और तेरा ख़याल-ए-हसीं       ( पिंजरा )
उस पे हरसू बहार की बातें

याद है तुझसे गुफ़्तगू करना
कभी इश्क़, कभी रार की बातें

नसीम-ए-सहर* मुझे भी सुना,       ( सुबह की ठंडी हवा )
गेसू-ए-मुश्क़बार* की बातें       ( खुशबूदार जुल्फें )

जब सुकूँ है कफ़स* में ऐ 'राही'       ( पिंजरा )
क्यूँ करें हम फ़रार* की बातें       ( भागने की बात )

                              " सईद राही "


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हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पर कितना तनहा होगा चाँद

जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात
उन आँखों में आँसू का इक क़तरा होगा चाँद

रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद

चाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद


                                      " राही मासूम रज़ा "


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दिन आ गए शबाब के आँचल संभालिये
होने लगी है शहर में हलचल संभालिये

चलिए संभल संभल के कठिन राह-ऐ-इश्क़ है
नाज़ुक बड़ी है आपकी पायल संभालिये

सज धज के आप निकले सर-ए-राह ख़ैर हो
टकरा न जाए आपका पागल संभालिये

घर से ना जाओ दूर किसी अजनबी के साथ
बरसेंगे जोर-शोर से बादल संभालिये


                                            " मदन पाल "


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नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है

खिलखिलाते हुए अपना दामन उठाते हुए
बच्चों के पाँव की धूल का कारवाँ
गाँव की हर गली अपने पैरों की ज़ंजीर है
गाँव का हर मकान अपने रस्ते की दीवार है
नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है

एक अँगोछा लपेटे हुए वक़्त बैठा है दहलीज़ पर
बांस के झुण्ड़ से बचके चलती रहगुज़र
वो गली के किनारे पर बैठी वज़ू करती
मस्जि़द की एक मीनार पर
कब की अटकी हुई इक अज़ान
जिसका सन्नाटा तलवार की धार है
नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है

मैं भी बरगद के साये में बैठी हुई
अपनी यादों की परछाईयाँ बेच दूँ
मेरे लफ्ज़ों में है उस उदासी कहानी का रस
जिसपे चलता न था कच्चे आँगन का बस
निमकियों के कड़े सख़्त लड़े
जो न जाने थे किसके लिए
आज भी किस कदर याद है
नींद के गाँव में आज यादों का बाज़ार है



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